मंगलवार, 24 अप्रैल 2018

पहली बार क्या हुआ, क्यों न इसका एक आंकड़ा एकत्रित किया जाये.......

100 दिनों की रोजगार गारण्टी योजना कांग्रेस की देन यह भी देश में पहली बार हुआ, खाद्य सुरक्षा अधिनियम देश में पहली बार आया, सूचना अधिकार अधिनियम देश में पहली बार आया, स्वास्थ्य बीमा योजना जो कि एनआरएचएम के तहत् जिसकी शुरूआत हुई वह भी देश में पहली बार हुआ, शिक्षा का अधिकार कानून आया वह भी देश में पहली बार हुआ। यदि इतिहास के पन्नों को पलटिये तो आप पायेंगे कि इस देशको जो कुछ भ्ीा मिला अधिकतर कांग्रेस के शासनकाल में मिला है और देश को पहली बार मिला है, इससे पहले अंग्रेजों ने तो दिया नहीं था, ऐसे में ये पहली बार- पहली बार की लड़ाई यदि दोनों पार्टियों में चले तो भाजपा तो 10 प्रतिशत के बराबर भी नहीं है। 
वर्तमान में देश के पास एक ऐसा प्रधानमंत्राी है जो बड़ा ही आत्ममुग्ध है। जैसा वह स्वयं हर काम को पहली बार बताने की चेष्टा में लगे रहते हैं, वैसे ही उनके चाहने वाले जिन्हें लोग अब अंधभक्त कहने लगे हैं वे भी उन चिजांे को लेकर फेसबुक, वाट्सअप एवं अन्य सोशल मिडिया में लगातार पोस्ट करते रहते हैं। जैसा नेता आत्मुग्ध और मन के अलावे किसी की भी बात नहीं सुनने वाला वैसा ही उसके चमचे किस्म के लोग भी मेरे मुर्गी के तीन टांग, तीन टांग रटते रहते हैं, आप उन्हें सही चिजें बताते थक जायंेगे, लेकिन वे आपकी बातों को सुनना पसंद नहीं करेंगे, यदि आपने कुछ ज्यादा हिम्मत दिखायी तो यकिन मानिये आपके लिये देशद्रोही का सर्टिफिकेट तुरंत ही जारी कर दिया जायेगा, पाकिस्तान का टिकट नहीं कटता बाकि जो कसर हो सब पुरा कर दिया जाता है। यह भक्तों की गलती नहीं है, यह गलती उस नेतृत्वकर्ता की जो कि स्वयं भी लगातार झूठ बोलता चला जा रहा है और दूसरों को भी 100 झूठ, हजार झूठ बोलने के लिये तैयार कर रहा है। 
               क्या देश मेें पहली बार सर्जिकल स्ट्राईक हुआ, क्या नोटबंदी से देश की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो गई, क्या कालेधन 100 दिनों में वापस आ गये, क्या पेट्रोल और डिजल के दामों में कमी हो गई, क्या पाकिस्तान से एक जवान के बदले दस सिर लाये जा रहे हैं या फिर आप लाहौर में बैठ कर बिरयानी खां रहे है? ऐसे कई सवाल है जो केवल मैं नहीं बल्कि देश का एक बड़ा तबका प्रधानमंत्राी जी से पुछना चाहता है, लेकिन सवाल यह है कि वह आखिर पूछे कैसे? प्रधानमंत्राी जी मन की बात करते तो हैं किन्तु जनता के मन की बात सुनना पसंद नहीं करते। यह देश का लोकतंत्रा नहीं है, आप विदेशों में जाते हैं हजारों की भीड़ एकत्रित कर लोगों से सवाल-जवाब करते हैं, महोदय वहीं कार्य आप देश के अंदर क्यों नहीं करते। देश भर में घुम-घुम कर बिना ट्रक-बस में लोगों की ढो कर भीड़ इक्ट्ठा किये बिना, खुद से आये लोगों के बीच में बैठ कर आप उनकी मन की बात सुनना पसंद क्यों नहीं करते? 
                 विगत दो दिनों से वाट्सएप, फेसबुक, ट्वीटर और अन्य सोशल मिडिया पर भाजपा द्वारा पोस्ट किये जा रहे हैं, बहनों को मिला इंसाफ, देश में पहली बार किसी सरकार ने बहनों के लिये बनाये कड़े कानून। स्वागत है इन कानूनों का, कानून सिर्फ बने नहीं, बल्कि उसका पालन हो, वर्षों तक मामला लंबित होने के बजाये, उस पर त्वरित फैसला हो तभी न्याय सही होगा, अन्यथा कई वर्षों बाद मिला हुआ न्याय, न्याय नहीं रह जाता। जो लोग फेसबुक, वाट्सएप, ट्वीटर पर देश में पहली बार पोस्ट डाल रहे हैं, उनसे अनुरोध है कि कृपया कभी इतिहास के पन्नों को पलट कर पढ़ने की कोशिश किजिये हिन्दी वालों के लिये हिन्दी और अंग्रेजी वालों के लिये अंगे्रजी में इतिहास के पन्नों में बहुत कुछ दर्ज है, जो पहली बार, पहली बार की रट आप लगाये हुए हैं, उनसे निवेदन है कृपया याद करें दामिनी मामले वह केस जब देश में पहली बार बहुत कुछ हुआ और कई कानून बनें। याद किजिये उसी दामिनी केस के बाद महिला बैंक की स्थापना भी की गई थी, किन्तु इसी भाजपा की सरकार ने उस महिला बैंक का स्टेट बैंक में विलय कर दिया, किन्तु नारी अस्मिता और सम्मान की बात करने वाले किसी भाजपा नेता ने यह नहीं कहा कि दामिनी मामले के बाद इस बैंक की स्थापना की गई थी, यदि इसे बंद नहीं किया जाता तो अच्छा होता।  यह वहीं भाजपा है जिसके विधायक  और भाई पर बलात्कार के आरोप लगे और यूपी में तथाकथित रामराज लाने वाले मुख्यमंत्राी योगी ने पिड़िता की एक न सुनी, उल्टे पिड़िता के पिता की वहां की सरकार के इशारे पर थाने में हत्या हो गई, क्या इसे भी सार्वजनिक करेंगे कि देश में पहली बार रेप पिड़िता के पिता को थाने में मार दिया गया। क्या आप यह भी देश को बताना चाहेंगे की तथाकथित रामराज में रेप के आरोपी को सरकार से सभी संसाधनों ने मिल कर बचाने का प्रयास किया।
            क्या भाजपा के फेसबुक, ट्वीटर एवं अन्य सोशल मिडिया के महारथी देश को यह बतायेंगे कि देश में पहली बार भाजपा की छ.ग. की राज्य सरकार ने एक युवती को नक्सली बताकर मारा और फिर उसकी मौत पर मुआवजा एवं उसके परिजन को नौकरी की घोषणा भी कर दी। जबकि युवती के साथ पुलिस वालों ने रेप किया और फिर गोली मारी और बचने के लिये नक्सली घोषित कर दिया। इसे भी पहली बार कह कर क्यों प्रचारित नहीं किया जाता। क्या यह भी देशवासियों को बताना चाहेंगे कि भाजपा की छ.ग. सरकार के संरक्षण में सैकड़ों बहनों के गर्भाष्य निकाल लिये गये, नसबंदी आॅपरेशन के दौरान कई की मौत हो गई, यह भी देश में पहली बार भाजपा के शासन में हुआ। किन्तु नहीं अपनी हर गलती को आप ढकना चाहते हैं, आप जनता के सवालों से बचना चाहते हैं, जनता से दूर भागना चाहते हैं। यदि आप वास्तव में बहनों की इज्जत करते, वास्तव में उनके सम्मान की बात करते तो सबसे पहले छत्तीसगढ़ की उन बहनों के मामलों में आरोपियों को कड़ी से कड़ी सजा दिलाते जो कि मिना खलखो, सोनी सोरी, गर्भाष्य काण्ड एवं नसबंदी काण्ड के प्रमुख आरोपी हैं। किन्तु आपने तो उन्हें संरक्षण देना सही समझा क्योंकि आप हर काम पहली बार करना चाहते हैं और उसे प्रचारित करना चाहते हैं। 
                आज भाजपा के जो लोग नारी सम्मान और अस्मिता की बात कर रहे हैं, जो लोग कानून को देश में पहली बार कह कर प्रचारित कर रहे हैं और मोदी को शेर बता रहे हैं, उनसे मेरा सवाल है क्या सोनी सोरी के गुप्तांगों में जब कंकड़ ठूंस दिये गये, उसे आरोपी साबित करने तमाम तरह के कृत्य किये गये, कम से कम आप की राष्ट्रवादी अस्मिता इस बात पर तो जागती कि ठीक है आरोपी है भी तो इसके गुप्तांगों के साथ इस तरह का कृत्य न किया जाये। देश देखता है, देश समझता है और फिर चुपचाप शांत हो जाता है और जब उत्तर देता है तो फिर पहली बार शब्द का कोई अस्तित्व नहीं रह जाता। भाजपा से जुड़े हुए बहुत सारी नेत्रियां मोदी को शेर बताते हुए, देश में पहली बार बताते हुए कई पोस्ट कर रही हैं, उनसे सवाल है जब आसिफा का मामला शुरू हुआ तब आपने यह पोस्ट क्यों नहीं डाला कि एक रेप के आरोपी को बचाने मंत्राी मंडल सड़क पर उतर आया, देश को क्यों नहीं बताया कि भाजपा में पहली बार रेप के आरोपी के बचाने की मंत्राी वकालत कर रहे हैं, यूपी में आरोपी विधायक एवं भाई को बचाने भाजपा के लोग रैली निकालते हैं, तब भाजपा के सोशल मिडिया के शुरवीर यह क्यों नहीं बताते कि देश में पहली बार तथाकथित रामराज में रेप के आरोपी को बचाने पुरा मंत्राी मंडल एक साथ है। नारी अस्मिता और सम्मान की बात करने वाले लोग केवल झूठ और भ्रम क्यों पैदा करते हैं। क्यों गलत चिजों को प्रसारित करना चाहते हैं, समझ से परे है। ऐसा लगने लगा है कि आत्ममुग्ध प्रधानमंत्राी को पाकर भाजपा को फाॅलो करने वाले लोग खुद में इस तरह से आत्ममुग्ध हो चुके हैं कि उन्हें अब सही गलत में फैसला कर पाने की समझ ही नहीं रही।  
          ये भाजपा के तथाकथित सोशल मिडिया एक्टीविस्ट ऐसे ऐसे पोस्ट डालते हैं समझ में ही नहीं आता कि ये लोग यह सब सिखते कहां से हैं, आज ही छ.ग. भाजपा आईटी सेल की एक पोस्ट देख रहा था, जिसमें उन्होंने वन अधिकार पट्टे के बारे में पोस्ट किया है, जिसमें लिखा है 2003 में कांग्रेस शासन काल में शून्य प्रकरण, भाजपा ने 2017 तक 3.35 लाख परिवारों को वन अधिकार मान्यता पत्रा बांटे। आईटी सेल के उन ज्ञाताओं को बताना चाहिए कि भाई साहब वन अधिकार अधिनियम 2006 में देश में लागू हुआ तो कांग्रेस 2003 में अधिकार पत्रा बांटती कैसे? यह आत्ममुग्धता की हद नहीं है तो और क्या है। एक दिन ऐसा ही पोस्ट छ.ग. सरकार के एक मंत्राी ने किया भारत के बाहर किसी दूसरे देश का फोटा डालकर उसे छत्तीसगढ़ का बता दिया। ऐसे पोस्ट से सामान्य तौर पर आप क्या अंदाजा लगा सकते, केवल यही न कि काम जीरो और बात हिरो की। मतलब करो कुछ मत लेकिन लोगों के बीच येनकेन प्रकारेण भ्रम की स्थिति निर्मित कर दो। 
           मुझे सोशल मिडिया पर आजकल के विशेष किस्म के भक्तों के साथ बहस करने पर तब बहुत मजा आता है, जब उनसे आप पुछिये कि भाई साहब कालाधन कब आयेगा, मोदी तो शेर हैं, वे 100 दिन में लाने को बोले थे, तब ये भक्त किस्म के लोग नियम और कानूनों को हवाला देते हैं, तब मेरा सवाल रहता है कि क्या मोदी चुनाव के वक्त अनपढ़ थे, जो उन्हें नियम व कानूनों का ज्ञान नहीं था और आज हो गया। तब ये भक्त ऐसे बिदकते हैं जैसे किसी ने सांप के पूंछ पर पैर रख दी, आप इनसे पुछिये भाई साहब अब तो देश के अधिकतर राज्यों में राष्ट्रवादी सरकार है राममंदिर कब बनेगा, ये आपको उच्चतम न्यायालय का हवाला देते हैं, किन्तु चुनाव के समय उच्चतम न्यायालय से भी आगे जाकर ये भाषण देते हैं कि हमारी सरकार राम मंदिर बनवायेगी। चुनाव के समय ये कहते हैं हम आयें तो पाकिस्तान को लव लेटर भेजना छोड़, एक सिर के बदले 10 सिर लायेंगे, आज स्थिति यह है कि लव लेटर के साथ-साथ गुलाब और गिफ्ट लेकर भी ये खुद ही डेटिंग पर पहुंच जा रहे हैं। किसानों की बात करने वाले आज किसानों की समस्या को भाषणों में ही समाप्त कर चुके हैं। अब तो मुझे यकिनन विश्वास हो चुका है कि वाकई में जिस तरह से चुनाव के वक्त झूठ बोला गया, जरूर साक्षर और अनपढ़ वाला कोई भेद है, तभी तो आज तक सर्टिफिकेट भी सही नहीं मिले। खैर, ईश्वर ऐसे लोगों को जल्द से जल्द ज्ञान दे कि ये सही रास्ते पर आ जायें, नहीं तो देश की जनता देश में पहली बार ऐसा कुछ जायेगी जो कि इनके समझ से बाहर हो जायेगा। 

शनिवार, 16 सितंबर 2017

महिलाएं हमारे घरों में कितना सम्मानित हैं.... रैली में नारा लगाने के पूर्व यह जरूर सोचें। : क्या प्रधानमंत्री को झूठ बोलने की आज़ादी है?

 क्या प्रधानमंत्री को झूठ बोलने की आज़ादी है?: क्या प्रधानमंत्री को झूठ बोलने की छुट है? जैसे-जैसे राष्ट्रवादी सरकार के 5 वर्ष पुरे होने को हैं, लोगों के मन में कई तरह के सवाल उठ रहे ...

क्या प्रधानमंत्री को झूठ बोलने की आज़ादी है?

क्या प्रधानमंत्री को झूठ बोलने की छुट है?

जैसे-जैसे राष्ट्रवादी सरकार के 5 वर्ष पुरे होने को हैं, लोगों के मन में कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। खुद मैं भी कई सवालों को लेकर असमंजस में रहता हूं और मैं चुनाव के पूर्व के प्रधानमंत्री उम्मीद्वार के वायदों से ज्यादा चुनाव के बाद देश के प्रधानमंत्री द्वारा सार्वजनिक रूप से बोले गये झूठ और झूठे वायदों को लेकर यह सोचता हूं कि क्या प्रधानमंत्री को झूठ बोलने की आज़ादी है? 
जेएनयू में आज़ादी के नारे लगाये जाते हैं, इन युवाओं को आज़ादी मिली या नहीं इस पर फिर कभी चर्चा करेंगे, किन्तु 2014 के आमसभा चुनाव ने नरेन्द्र मोदी को एक आज़ादी दे दी और वह था, झूठ बोलने की आज़ादी। पिछले तीन वर्षों में उनके द्वारा दिये गये भाषणों पर यदि हम चर्चा करेंगे तो देश के सामने एक झूठा प्रधानमंत्री खड़ा मिलेगा, किन्तु मैं पिछले एक वर्ष के कुछ भाषणों पर आमजनों की बीच चर्चा करना चाहता हूं। 8 नवम्बर का वह दिन, जब एक  व्यक्ति ने तमाम इलेक्ट्रॉनिक चैनलों एवं रेडियो के माध्यम से यहां कहा कि भाईयों और बाहनों आज आधी रात से आपके हाथ में पड़ा 500 और 1000 का नोट केवल कागज टूकड़ा है और इसकी वैधता समाप्त कर दी गई है तो मानों हर एक शक्स के पैरों तले जमीन खिंसक गई, चाहे वह गरीब परिवार रहा हो, अथवा मध्यमवर्गीय परिवार, परिवार का हर एक सदस्य इस सोच में था कि मैंने परिवार के सदस्यों से चोरी-छूपे 500 और 1000 के जो नोट छूपाये हैं क्या वह वास्तव में अब केवल कागज का टूकड़ा रह गया है।  बैकों में लगने वाली लम्बी लाईन और कई तरह की समस्याओं के बावजुद लोगांे ने कथित देशभक्त प्रधानमंत्री के इरादों को पुरा करने में पूर्ण सहयोग किया और नोटबंदी को सही बताया, क्योंकि इससे कालाधन समाप्त होने वाला था, क्यों कि इससे आतंकवाद एवं नक्सलवादी गतिविधियों पर लगाम लगने वाली थी। समय बढ़ता गया, लोगों की समस्याएं भी बढ़ती रही, लेकिन कभी किसी ने इसकी शिकायत प्रधानमंत्री जी से नहीं की क्यों कि देश बदलाव चाहता था, क्योंकि देश अच्छा दिन देखना चाहता था। 
इस बीच देश के प्रधानमंत्री जी ने कई भाषण दिये और कई तरह के आरोप विपक्षी दलों से लेकर देश एवं विश्व स्तर के अर्थशास्त्राीयों एवं विद्वानों पर लगाये। प्रधानमंत्री जी ने अपने सरकार के फैसले को सही ठहराते हुए बाकि सभी को झुठा बतलाया। उन्होंने यहां तक कहा कि विपक्षी दल जो 60 वर्षों में देश का विकास नहीं कर सकी वे अब कालाधन रखने वालों की वकालत कर रही है। 
प्रधानमंत्री जी ने एक चुनावी सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि हार्वड वालों पर हार्ड वर्क वाले भारी पड़ गये और उन्होंने देश के पूर्व प्रधानमंत्री एवं विश्व के जाने में अर्थशास्त्राी डॉ. मनमोहन सिंह सहित अमर्त्य सेन एवं कई अन्य लोगों का सार्वजनिक तौर पर माखौल उड़ाया और सरकार के फैसले को सही करार दिया। देश के प्रधानमंत्री ने एक भाषण के दौरान ड्रामा करते हुए रोने सी आवाज़ निकाल कर कहा कि भाईयों बहनों मैंने देश के लिये अपना घर-परिवार सब छोड़ दिया, मुझे केवल 50 दिन चाहिए, यदि देश में बदलाव न आया, नोटबंदी का उचित परिणाम न निकला तो आप देश के जिस चौराहे पर जो सजा देना चाहेंगे मैं भुगतने को तैयार हूं किन्तु मुझे 50 दिन दीजिये। 
देश के प्रधानमंत्री नोटबंदी के पहले दिन से अंतिम तक लगातार जनता से झूठ बोलते रहे, अपने फैसले को सही बताते रहे, किन्तु अंत में परिणाम क्या आया, नोटबंदी से देश को फायदा होना छोड़ घाटा हुआ, जो कि लम्बे समय तक बरकरार रहेगा। ऐसे में मेरा देश के प्रधानमंत्री से यह सवाल है कि चुनाव के बाद प्रधानमंत्री के रूप में पद सम्हालते हुए आपने शपथ लिया था, उसमें क्या बातें आपने बोली थीं, ज़रा याद करें आप लगातार जनता से झूठ बोलते जा रहे हैं, आपको तो पद की गरिमा का ख्याल रखते हुए माफी मांग कर अपना बड़प्पन दिखाना चाहिए, कम से कम अपने झूठ के लिये देशवासियों से न सही उन अर्थशास्त्राी पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह जी एवं अमर्त्य सेन जी सहित अन्य विद्वानों से तो माफी मांग लें जिनका आपने एक सार्वजनिक सभा में माखौल उड़ाया था। 
देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी आप जिस पद पर हैं उससे देश की गरिमा जुड़ी हुई है, आप अभी चुनावी सभा नहीं कर रहे, आप जो बोलते हैं अब प्रधानमंत्री की हैसियत से बोलते हैं, अपने स्क्रीप्ट राईटर को बोलें कि कम से कम प्रधानमंत्री पद के अनुरूप भाषण तैयार करे, चुनाव के दौरान जनता से झूठ बोलने वाले फेकूं नेता की तरह नहीं। प्रधानमंत्री देश के प्रमुख विभाग के सर्र्वे सर्वा आप हैं, आप तक यह बात तो जरूर पहुंचती होगी अप्रैल से जून की तिमाही में आर्थिक विकास दर 5.7 फीसदी रह गई है जो कि गत 3 वर्षों में सबसे कम है। आप तक यह बात भी पहुंचती होगी कि नोटबंदी के शुरूआत 3-4 महिनों में ही लोगों की 15 लाख से अधिक नौकरियां समाप्त हो गई,  लोग बरोजगार हो गये और यह आंकड़ा लगातार बड़ता चला जा रहा है। असंगठित क्षेत्रा में आज भी रोजगार की स्थिति दयनीय है, कई छोटे उद्योग तो एक वर्ष होने को हैं अब तक प्रारंभ नहीं हो सके हैं, कईयों ने हमेशा-हमेशा के लिये ताला लगा दिया है। कृषि क्षेत्रा में भी स्थिति सुधर नहीं रही है, इसके बावजुद आप जनता के बीच झूठ बोलते हैं, झूठ प्रचारित करते हैं। यह सब आप कैसे कर लेते हैं? नोटबंदी में तमाम समस्या के बावजुद आप डीजल-पेट्रोल, रसोई गैस की किमतों में वृद्धि कर लगातार जनता के ऊपर बोझ बढ़ाते जा रहे हैं। वह आप ही थे न जिन्होंने नसीब की बात की थी कि यदि मोदी के अच्छे नसीब से पेट्रोल-डीजल के दाम घटते हैं तो फिर देश को नसीब वाला प्रधानमंत्री चाहिए या बदनसीब प्रधानमंत्री।
 मोदी जी आप कभी किसी परिवार का अंग बन कर देखिये कि किसी परिवार में यदि शादी-विवाह जैसा आयोजन होता है तो उस परिवार में रूपये कि अहमियत कितनी होती है और आप विदेश में जाकर देश की जनता का यह माखौल उड़ाते हैं कि परिवार में शादी है लेकिन पैसे नहीं, ताली बजाकर हंसते हैं, क्या यह एक देश के प्रधानमंत्री पद की गरिमा है। जनसेवक वह होता है जो जनता की समस्याओं के लिये तत्पर रहे, वह नहीं जो उसकी समस्याओं पर ताली पिटे। आप कहते हैं 60 सालों में पूर्ववर्ती सरकारों ने क्या किया? प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी 60 वर्षों में पूर्ववर्ती सरकारों ने जनता को इस काबिल बना दिया कि टी.वी., वाट्सएप, फेसबुक, ट्वीटर और अन्य सोशल मिडिया पर चलने वाले भ्रमित विज्ञापनों को देख कर एक झूठ की सरकार देश में बना डाली। आपके सरकार को 4 वर्ष पूर्ण होने वाले हैं, प्रधानमंत्री जी हर वर्ष जब आपकी सरकार पूर्ण करती है तो आपकी पार्टी तमाम तरह की जश्न घुम-घुम कर मनाती है, मेरा आपसे आग्रह है कि इस बार जब 4 वर्ष पूर्ण हो तो बिना किसी जश्न के अपने सांसदों को, अपने मंत्रियों को, अपने पार्टी के नेताओं को बिना किसी लाव-लश्कर के जनता के बीच भेज कर उनकी समस्याएं जानने की कोशिश किजियेगा, न कि अपने झूठ को प्रचारित करने के लिये करोड़ों रूपये कार्यक्रम के नाम पर फूंक दीजियेगा। आपके पास तो आरएसएस जैसी संगठन है जिसके लोग हर गली-मुहल्ले में फैले हुए हैं, उन्हें तो देश की सच्चाई और सरकार के प्रति लोगों में रोष साफ-साफ दिखता होगा, वे लोग आप तक बात पहुंचाते भी होंगे, फिर आप इतना झूठ बे-झिझक कैसे बोल लेते हैं। 
आप देश के प्रधानमंत्री हैं, आप को कई लोग फॉलो करते हैं, कई के रोल मॉडल भी आप हैं, यदि आप लोगों के बीच में झूठ बोलेंगे तो देश के युवाओं को क्या सीख देंगे, उन्हें आप झूठ बोलना सीखा रहे हैं। आपको देश को बदलने के लिये प्रधानमंत्री बनाया गया है, आपको आज़ादी मिली हुई है कि आप अपने स्वपन अपनी योजनाओं के अनुसार देश में बदलावा लायें, न कि आपको झूठ बोलने की आज़ादी दी गई है? झूठ तो हर कोई कहीं न कहीं बोलता है लेकिन कुछ पदों की गरिमा होती है, यह अब आपको तय करना है कि प्रधानमंत्री पद की गरिमा क्या होनी चाहिए? 
अंचल ओझा, अम्बिकापुर

रविवार, 24 जुलाई 2016

महिलाएं हमारे घरों में कितना सम्मानित हैं.... रैली में नारा लगाने के पूर्व यह जरूर सोचें।


हम सभ्य लोग हैं, हमारी पहचान सभ्य समाज में निवास करने वाले एक जागरूक व्यक्ति के रूप में होती है, हम में से अधिकतर अपने आप को यही कहलाना पसंद करते हैं। कोई भी व्यक्ति अपने आप को असभ्य समाज का बताना पसंद नहीं करता, चाहे वह कितना ही असभ्य क्यों न हो वह अपनी पहली परिचय अपने आप को सभ्य बता कर ही करता है। इन दिनों महिलाओं के ऊपर टीका-टिप्पणी को लेकर अच्छा-खासा बहस हरेक न्यूज चैनल पर और सभी समाचार पत्रों में कुछ न कुछ आ ही रहा है। इन सब के बीच वर्तमान में जो बहस का मुद्दा है, उससे हट कर मेरा मुद्दा महिलाओं से ही जुड़ा कुछ अलग है, जो कि प्रत्येक दिन हम सब के घरों में घटित होता है, किन्तु उसकी आवाज, उसकी चिखें कहीं सुनाई नहीं देती, इसे हमारा यह सभ्य समाज जो कि सभ्य है नहीं, इसे दबा देता है या फिर दबाना चाहता है, अपनी उस झूठी इज्जत के लिये जो कि है ही नहीं।
एक लड़की या फिर यह कहंे कि एक औरत की जिंदगी इतना संघर्ष भरा होता है कि उसे जितना समझने का प्रयास करें वह और भी जटिल होता चला जाता है। लड़की का जन्म जिसे आज भी हमारे समाज में अभिषाप माना जाता है, पिछले कुछ समय में हालात बदले हैं, किन्तु हमारी मानसिकता कितनी बदली हमें स्वयं में सोचने की आवश्यता है। किसी तरह से एक मां लड़-झगड़ कर अपनी बेटी को जन्म दे देती है और फिर जब उसे पालना शुरू करती है तो फिर शुरू होता है असली संघर्ष, बेटी अभी छोटी है, स्कूल में पढ़ती है, लेकिन सबसे पहले हमारे पड़ोसी को यह चिंता होती है कि अरे! उसे कुछ सिखाओं घर के काम सिखाओं, ससुराल जायेगी तो क्या करेगी, उसे तो तुम केवल पढ़ा रहे हो, ज्यादा पढ़ाओगे तो शादी कैसे करोगे, पड़ोसी की यह छोटी-सी बात ऐसी घर कर जाती है कि अब घर में कोहराम सा मच जाता है। अभी लड़की 15-16 साल की हुई भी नहीं कि घर के सारे काम उससे कराना शुरू कर दिया जाता है, क्योंकि ससुराल में उसे यही करना है। बेटी किसी तरह मिडिल से हाई स्कूल पहुंच गई गांव में स्कूल है तो ठीक नहीं तो बाहर पढ़ने भेजने का तो सवाल ही नहीं है। किसी तरह मां ने अपने मनाया और पिता उसे आगे पढ़ाने के लिये तैयार हो गये, किन्तु अब सवाल यह है कि जो सभ्य समाज है, जिसमें सभ्य दर्जे के युवा या यूं कहे की पुरूष रहता है, उसकी नज़रों से बचाना भी एक अभिभावक की जिम्मेदारी हो जाती है। इससे भी यदि किसी तरह निकल गये और अब जब अपनी लड़की की शादी कर रहे हैं तो पहला सवाल खड़ा होता है, कितना दोगे, साफ है दहेज की चर्चा हो रही है। दहेज तो लाखों में मिल गये, हो सकता है कुछ ने अपनी हैसियत भर दिया, किन्तु फिर भी क्या अब शादी हो जाने के बाद वह लड़की जो कल तक केवल एक परिवार का हिस्सा थी, आज जो स्वयं एक परिवार को चलाने के लायक बन गई है, उसका स्वयं का एक परिवार है, उसका संघर्ष खत्म हुआ, जी नहीं, बिल्कुल नहीं अभी तो असली संघर्ष शुरू हुआ है। 
आज भी हमारे इस आधुनिक समाज में जो कि चांद-तारे तक पहुंच गया है, उसी सभ्य समाज में शादी के बाद बहु का प्रथम और पहला कार्य है नौकरानी का, कुछ लोग जिनके घर में यह नहीं होता शायद बुरा लगे, किन्तु 80 प्रतिशत से भी अधिक घर ऐसे हैं, जहां शादी के बाद बहु का सिर्फ और सिर्फ एक काम होता है घर के झाड़ु से लेकर बर्तन धोना, खाना बनाने से लेकर घर के कपड़े धोना और फिर इसके अलावे घर के वो सारे कार्य जो आवश्यक हैं। किन्तु आप सभी यह सोच रहे होंगे कि यह तो महिला का कार्य ही है, चलिये आपकी बातों को हम मान लेते हैं साहेब! किन्तु मेरा कथन है कि क्या इसके बाद भी एक महिला की जिंदगी बहुत अच्छे से हंसी-खुशी कटती है। जी! नहीं, बिल्कुल नहीं। अभी तो इसे खाना बनाने ही नहीं आता, कभी नमक ज्यादा डालती है तो कभी शक्कर कम डालती है, सब्जी कभी सुखी बन गई तो कभी चावल गीला हो गया साहेब, क्या कहें बहु विश्व की पहली ऐसी नौकरानी है, जो काम करने के बदले पैसे नहीं लेती साहेब, बल्कि शादी के दौरान मायके से पैसे और दहेज के रूप में बहुत कुछ लेकर आती है, फिर भी बात-बात पर जिल्लत सहना पड़ता है। चलों ठीक से खाना नहीं बनाया, उसे तो आपने गालीयां दी हीं, ताने मारे ही, उसके मां-बाप ने क्या जुर्म किया था कि उन्हें भी ताना मारना, बाते सुनाना आपने शुरू कर दिया। प्रत्येक घरों में महिलाओं के साथ होने वाली रोज-रोज की इस अपमान और जुर्म के लिये क्या कोई अदालत, कोई न्यूज चैनल, कोई समाचार पत्र या फिर कोई नेता कभी आवाज़ उठायेगा, क्या कानून में इतना सुधार हो सकेगा कि जांच हमेशा सही दिशा में हो पैसे के बल पर अपराधी बच न सकें। आप यकिन मानिये जब आप सच्चाई को जानने निकलेंगे तो आप यह पायेंगे कि जो एक तबका, एक बड़ा सा घर, ऐशो आराम की जिंदगी, बड़ी-बड़ी कारें और शिशे की खिड़की जिन घरों में है उस घर की महिला में मानसिक, शारिरिक घरेलु प्रताड़ना से उतनी ही पिड़ित है, जितना एक मध्यमवर्गीय परिवार की महिला।
ठीक यहीं परिस्थिति घर की बेटी, पत्नि एवं उन सभी महिलाओं के साथ है जो कि घर-परिवार की सदस्य हैं। यदि किसी घर में ज्यादा खुलापन है तो यह भी समाज के एक हिस्से को पसंद नहीं है, समाज में कई तरह के लोग हैं और सबके देखने का तरिका अलग-अलग है। एक महिला बेटी के रूप में जन्म लेने के पूर्व एवं बाद में, पत्नि एवं बहु के रूप में, सास एवं अन्य रूप में हर जगह कहीं ने कहीं किसी न किसी माध्यम से प्रताड़ित है। भले ही वह मानसिक, शारिरिक या फिर कुछ और हो। हम अपने घरों में स्वयं इस स्थिति को ठीक नहीं कर पाते, किन्तु सड़कों पर निकलने वाली रैलियों में सबसे आगे होकर नारा लगाना चाहते हैं, नारी के सम्मान की, नारी के अस्मिता की और भी बहुत कुछ, आखिर यह दिखावा क्यों। 
च्तवजमबजपवद व िॅवउंद तिवउ क्वउमेजपब टपवसमदबम ।बज 2005 को सरकार ने 26 अक्टूबर 2006 को देशभर में लागू करने की अधिसूचना जारी कि किन्तु इसके बाद भी कितना बदलाव हमारे इस समाज में हम में स्वयं में महिलाओं को लेकर आया है यह चिंता करने की आवश्यकता है। ईमानदारी से यदि स्वीकार करें तो यह घरेलु प्रताड़ना हम सब के घर में है, जिसे हम समाज से छुपाना चाहते हैं और अपने घरों में महिलाओं के साथ छोटी-छोटी चिजों के लिये ऐसा बर्ताव करते हैं जो हमें करना नहीं चाहिए। हमारे घरों में भावनात्मक प्रताड़ना, मानसिक प्रताड़ना, ताना देना, अपमानित करना, नीचा दिखाना, मायके नहीं जाने देना, घर की चारदिवारी में बंद रखना जैसी बातें रोज की हैं, सास-बहु के झगड़े हर घर में हो रहे हैं, किन्तु कुछ ही घर ऐसे हैं जहां पर या तो बहु सास से आगे निकल गई है अथवा ससुराल वालों को थाने में लाकर उन्हें यह बताया है कि मैं भी इसी समाज की अंग हूं और मुझे भी हंसी-खुशी जीने का अधिकार है, मैं घर की नौकरानी नहीं हूं, मेरे भी सपने हैं, जिन्हें साकार करने का मुझे पुरा हक है। 
अभी हाल ही में देश के सर्वाेच्च न्यायालय ने कहा है कि बहु घर की नौकरानी नहीं, बल्कि घर की एक सदस्य है, उससे साथ वहीं व्यवहार होना चाहिए जो कि घर के प्रत्येक सदस्य को साथ होता है। बहु के भी सपने हैं, उसे भी अपने सपने पुरा करने का हक है। इसे हम उससे नहीं छीन सकते, यह उसका मौलिक अधिकार है। सरकार ने घरेलु प्रताड़ना अधिनियम लागू जरूर किया है लेकिन अभी भी इसका व्यापक प्रचार-प्रसार नहीं हो सका है, लोगों यह मालुम हो जाये कि हम घर में अपने बहु के साथ जो व्यवहार कर रहे हैं भावनात्मक प्रताड़ना, मानसिक प्रताड़ना, ताना देना, अपमानित करना, नीचा दिखाना, मायके नहीं जाने देना, घर की चारदिवारी में बंद रखना जैसी बातों के लिये सरकार ने कानून बनाया है, जिसके तहत् ऐसा करना दण्डनीय अपराध मानते हुए इसे गैरजमानती अपराध माना है, जिसके लिये एक वर्ष या उससे अधिक का जेल एवं 20 हजार रूपये का अर्थ दण्ड निर्धारित है। इतना कुछ होने के बावजुद ना तो महिलाएं व लड़कियां घर में सुरक्षित हैं ना ही घर के बाहर। कानून तो बहुत से बन गये, किन्तु उसका जोरदार असर देखने को नहीं मिला। हालात् पिछले कुछ वर्ष में काफी बदले हैं, किन्तु वह नहीं के बराबर है, दिखावे के लिये तो हम बहुत कुछ करते हैं अथवा करने की कोशिश करते हैं, किन्तु हमारी मानसिकता अभी भी नहीं बदली और अंदर से हम आज भी वैसे ही हैं जैसे कल थे। 
                                                                                                                       
- Anchal Ojha, Ambikapur