हम सभ्य लोग हैं, हमारी पहचान सभ्य समाज में निवास करने वाले एक जागरूक व्यक्ति के रूप में होती है, हम में से अधिकतर अपने आप को यही कहलाना पसंद करते हैं। कोई भी व्यक्ति अपने आप को असभ्य समाज का बताना पसंद नहीं करता, चाहे वह कितना ही असभ्य क्यों न हो वह अपनी पहली परिचय अपने आप को सभ्य बता कर ही करता है। इन दिनों महिलाओं के ऊपर टीका-टिप्पणी को लेकर अच्छा-खासा बहस हरेक न्यूज चैनल पर और सभी समाचार पत्रों में कुछ न कुछ आ ही रहा है। इन सब के बीच वर्तमान में जो बहस का मुद्दा है, उससे हट कर मेरा मुद्दा महिलाओं से ही जुड़ा कुछ अलग है, जो कि प्रत्येक दिन हम सब के घरों में घटित होता है, किन्तु उसकी आवाज, उसकी चिखें कहीं सुनाई नहीं देती, इसे हमारा यह सभ्य समाज जो कि सभ्य है नहीं, इसे दबा देता है या फिर दबाना चाहता है, अपनी उस झूठी इज्जत के लिये जो कि है ही नहीं।
एक लड़की या फिर यह कहंे कि एक औरत की जिंदगी इतना संघर्ष भरा होता है कि उसे जितना समझने का प्रयास करें वह और भी जटिल होता चला जाता है। लड़की का जन्म जिसे आज भी हमारे समाज में अभिषाप माना जाता है, पिछले कुछ समय में हालात बदले हैं, किन्तु हमारी मानसिकता कितनी बदली हमें स्वयं में सोचने की आवश्यता है। किसी तरह से एक मां लड़-झगड़ कर अपनी बेटी को जन्म दे देती है और फिर जब उसे पालना शुरू करती है तो फिर शुरू होता है असली संघर्ष, बेटी अभी छोटी है, स्कूल में पढ़ती है, लेकिन सबसे पहले हमारे पड़ोसी को यह चिंता होती है कि अरे! उसे कुछ सिखाओं घर के काम सिखाओं, ससुराल जायेगी तो क्या करेगी, उसे तो तुम केवल पढ़ा रहे हो, ज्यादा पढ़ाओगे तो शादी कैसे करोगे, पड़ोसी की यह छोटी-सी बात ऐसी घर कर जाती है कि अब घर में कोहराम सा मच जाता है। अभी लड़की 15-16 साल की हुई भी नहीं कि घर के सारे काम उससे कराना शुरू कर दिया जाता है, क्योंकि ससुराल में उसे यही करना है। बेटी किसी तरह मिडिल से हाई स्कूल पहुंच गई गांव में स्कूल है तो ठीक नहीं तो बाहर पढ़ने भेजने का तो सवाल ही नहीं है। किसी तरह मां ने अपने मनाया और पिता उसे आगे पढ़ाने के लिये तैयार हो गये, किन्तु अब सवाल यह है कि जो सभ्य समाज है, जिसमें सभ्य दर्जे के युवा या यूं कहे की पुरूष रहता है, उसकी नज़रों से बचाना भी एक अभिभावक की जिम्मेदारी हो जाती है। इससे भी यदि किसी तरह निकल गये और अब जब अपनी लड़की की शादी कर रहे हैं तो पहला सवाल खड़ा होता है, कितना दोगे, साफ है दहेज की चर्चा हो रही है। दहेज तो लाखों में मिल गये, हो सकता है कुछ ने अपनी हैसियत भर दिया, किन्तु फिर भी क्या अब शादी हो जाने के बाद वह लड़की जो कल तक केवल एक परिवार का हिस्सा थी, आज जो स्वयं एक परिवार को चलाने के लायक बन गई है, उसका स्वयं का एक परिवार है, उसका संघर्ष खत्म हुआ, जी नहीं, बिल्कुल नहीं अभी तो असली संघर्ष शुरू हुआ है।
आज भी हमारे इस आधुनिक समाज में जो कि चांद-तारे तक पहुंच गया है, उसी सभ्य समाज में शादी के बाद बहु का प्रथम और पहला कार्य है नौकरानी का, कुछ लोग जिनके घर में यह नहीं होता शायद बुरा लगे, किन्तु 80 प्रतिशत से भी अधिक घर ऐसे हैं, जहां शादी के बाद बहु का सिर्फ और सिर्फ एक काम होता है घर के झाड़ु से लेकर बर्तन धोना, खाना बनाने से लेकर घर के कपड़े धोना और फिर इसके अलावे घर के वो सारे कार्य जो आवश्यक हैं। किन्तु आप सभी यह सोच रहे होंगे कि यह तो महिला का कार्य ही है, चलिये आपकी बातों को हम मान लेते हैं साहेब! किन्तु मेरा कथन है कि क्या इसके बाद भी एक महिला की जिंदगी बहुत अच्छे से हंसी-खुशी कटती है। जी! नहीं, बिल्कुल नहीं। अभी तो इसे खाना बनाने ही नहीं आता, कभी नमक ज्यादा डालती है तो कभी शक्कर कम डालती है, सब्जी कभी सुखी बन गई तो कभी चावल गीला हो गया साहेब, क्या कहें बहु विश्व की पहली ऐसी नौकरानी है, जो काम करने के बदले पैसे नहीं लेती साहेब, बल्कि शादी के दौरान मायके से पैसे और दहेज के रूप में बहुत कुछ लेकर आती है, फिर भी बात-बात पर जिल्लत सहना पड़ता है। चलों ठीक से खाना नहीं बनाया, उसे तो आपने गालीयां दी हीं, ताने मारे ही, उसके मां-बाप ने क्या जुर्म किया था कि उन्हें भी ताना मारना, बाते सुनाना आपने शुरू कर दिया। प्रत्येक घरों में महिलाओं के साथ होने वाली रोज-रोज की इस अपमान और जुर्म के लिये क्या कोई अदालत, कोई न्यूज चैनल, कोई समाचार पत्र या फिर कोई नेता कभी आवाज़ उठायेगा, क्या कानून में इतना सुधार हो सकेगा कि जांच हमेशा सही दिशा में हो पैसे के बल पर अपराधी बच न सकें। आप यकिन मानिये जब आप सच्चाई को जानने निकलेंगे तो आप यह पायेंगे कि जो एक तबका, एक बड़ा सा घर, ऐशो आराम की जिंदगी, बड़ी-बड़ी कारें और शिशे की खिड़की जिन घरों में है उस घर की महिला में मानसिक, शारिरिक घरेलु प्रताड़ना से उतनी ही पिड़ित है, जितना एक मध्यमवर्गीय परिवार की महिला।
ठीक यहीं परिस्थिति घर की बेटी, पत्नि एवं उन सभी महिलाओं के साथ है जो कि घर-परिवार की सदस्य हैं। यदि किसी घर में ज्यादा खुलापन है तो यह भी समाज के एक हिस्से को पसंद नहीं है, समाज में कई तरह के लोग हैं और सबके देखने का तरिका अलग-अलग है। एक महिला बेटी के रूप में जन्म लेने के पूर्व एवं बाद में, पत्नि एवं बहु के रूप में, सास एवं अन्य रूप में हर जगह कहीं ने कहीं किसी न किसी माध्यम से प्रताड़ित है। भले ही वह मानसिक, शारिरिक या फिर कुछ और हो। हम अपने घरों में स्वयं इस स्थिति को ठीक नहीं कर पाते, किन्तु सड़कों पर निकलने वाली रैलियों में सबसे आगे होकर नारा लगाना चाहते हैं, नारी के सम्मान की, नारी के अस्मिता की और भी बहुत कुछ, आखिर यह दिखावा क्यों।
च्तवजमबजपवद व िॅवउंद तिवउ क्वउमेजपब टपवसमदबम ।बज 2005 को सरकार ने 26 अक्टूबर 2006 को देशभर में लागू करने की अधिसूचना जारी कि किन्तु इसके बाद भी कितना बदलाव हमारे इस समाज में हम में स्वयं में महिलाओं को लेकर आया है यह चिंता करने की आवश्यकता है। ईमानदारी से यदि स्वीकार करें तो यह घरेलु प्रताड़ना हम सब के घर में है, जिसे हम समाज से छुपाना चाहते हैं और अपने घरों में महिलाओं के साथ छोटी-छोटी चिजों के लिये ऐसा बर्ताव करते हैं जो हमें करना नहीं चाहिए। हमारे घरों में भावनात्मक प्रताड़ना, मानसिक प्रताड़ना, ताना देना, अपमानित करना, नीचा दिखाना, मायके नहीं जाने देना, घर की चारदिवारी में बंद रखना जैसी बातें रोज की हैं, सास-बहु के झगड़े हर घर में हो रहे हैं, किन्तु कुछ ही घर ऐसे हैं जहां पर या तो बहु सास से आगे निकल गई है अथवा ससुराल वालों को थाने में लाकर उन्हें यह बताया है कि मैं भी इसी समाज की अंग हूं और मुझे भी हंसी-खुशी जीने का अधिकार है, मैं घर की नौकरानी नहीं हूं, मेरे भी सपने हैं, जिन्हें साकार करने का मुझे पुरा हक है।
अभी हाल ही में देश के सर्वाेच्च न्यायालय ने कहा है कि बहु घर की नौकरानी नहीं, बल्कि घर की एक सदस्य है, उससे साथ वहीं व्यवहार होना चाहिए जो कि घर के प्रत्येक सदस्य को साथ होता है। बहु के भी सपने हैं, उसे भी अपने सपने पुरा करने का हक है। इसे हम उससे नहीं छीन सकते, यह उसका मौलिक अधिकार है। सरकार ने घरेलु प्रताड़ना अधिनियम लागू जरूर किया है लेकिन अभी भी इसका व्यापक प्रचार-प्रसार नहीं हो सका है, लोगों यह मालुम हो जाये कि हम घर में अपने बहु के साथ जो व्यवहार कर रहे हैं भावनात्मक प्रताड़ना, मानसिक प्रताड़ना, ताना देना, अपमानित करना, नीचा दिखाना, मायके नहीं जाने देना, घर की चारदिवारी में बंद रखना जैसी बातों के लिये सरकार ने कानून बनाया है, जिसके तहत् ऐसा करना दण्डनीय अपराध मानते हुए इसे गैरजमानती अपराध माना है, जिसके लिये एक वर्ष या उससे अधिक का जेल एवं 20 हजार रूपये का अर्थ दण्ड निर्धारित है। इतना कुछ होने के बावजुद ना तो महिलाएं व लड़कियां घर में सुरक्षित हैं ना ही घर के बाहर। कानून तो बहुत से बन गये, किन्तु उसका जोरदार असर देखने को नहीं मिला। हालात् पिछले कुछ वर्ष में काफी बदले हैं, किन्तु वह नहीं के बराबर है, दिखावे के लिये तो हम बहुत कुछ करते हैं अथवा करने की कोशिश करते हैं, किन्तु हमारी मानसिकता अभी भी नहीं बदली और अंदर से हम आज भी वैसे ही हैं जैसे कल थे।

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